आस्था का अनूठा संगम
मंडला में महाराष्ट्र के श्रद्धालुओं ने शुरू की दो दिवसीय ‘उत्तरवाहिनी नर्मदा परिक्रमा’
- पुण्य लाभ का महापर्व
- उत्तरवाहिनी रेवा तट की परिक्रमा कर श्रद्धालुओं ने लिया सुख-समृद्धि का संकल्प
मंडला महावीर न्यूज 29. नर्मदा नगरी मंडला में उत्तरवाहिनी माँ नर्मदा की परिक्रमा का उत्साह चरम पर है। विगत छह वर्षों की परंपरा को जारी रखते हुए, परिक्रमा के दूसरे चरण का भव्य आयोजन विशेष रूप से महाराष्ट्र से आए श्रद्धालुओं के लिए किया जा रहा है। नासिक, पंढरपुर, मुंबई और पुणे समेत जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए भक्तों ने दो दिवसीय आस्था की इस यात्रा का शुभारंभ किया।
महाराष्ट्र के भक्तों के लिए विशेष प्रावधान
अमरकंटक से माँ नर्मदा का उद्गम है और खंबात की खाड़ी तक माँ नर्मदा प्रवाहित होती है, इस पूरे मार्ग में तीन स्थान ऐसे हैं जहां माँ रेवा उत्तर दिशा में प्रवाहित हुई हैं। जहां-जहां माँ नर्मदा उत्तर दिशा में प्रवाहित हुई उतने क्षेत्र की परिक्रमा करने का प्रावधान शास्त्रों में बताया गया है। गणना पद्धति में 15 दिनों के अंतर के कारण, चैत्र मास समाप्त होने के बाद यह दूसरा चरण विशेष रूप से महाराष्ट्र के श्रद्धालुओं के लिए आयोजित किया जाता है। मान्यता है कि जो भक्त किन्हीं कारणों से संपूर्ण नर्मदा परिक्रमा नहीं कर पाते, उन्हें उत्तरवाहिनी परिक्रमा करने से समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
व्यास नारायण मंदिर में संकल्प और रुद्राभिषेक
परिक्रमा का प्रारंभ व्यास नारायण मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुआ। स्थानीय विद्वान पंडित श्री रामायणी दुबे एवं राजेंद्र तिवारी जी के द्वारा रुद्राभिषेक संपन्न कराया गया। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने माँ नर्मदा के जल से संकल्प लेकर अपनी यात्रा शुरू की। बहुत से भक्तों ने पैदल तो कुछ ने दोपहिया वाहनों के माध्यम से परिक्रमा की। पंढरपुर से आए श्रद्धालु अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ कीर्तन करते हुए भक्ति भाव में डूबे नजर आए।
सेवा और विश्राम की व्यवस्था
परिक्रमा मार्ग पर श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया है। राधा राज आश्रम में भक्तों के लिए बालभोग और मौसमी फलों के प्रसाद की व्यवस्था की गई, वहीं दोपहर का भोजन सिलपुरा स्थित शिव मंदिर में संपन्न हुआ। श्रद्धालु रात्रि विश्राम घाघा आश्रम में करेंगे, जिसके बाद दूसरे दिन तट परिवर्तन कर अपनी यात्रा को आगे बढ़ाएंगे। संध्या काल तक यह परिक्रमा पुनः व्यास नारायण मंदिर पहुँचकर पूर्ण होगी।
उत्तरवाहिनी का आध्यात्मिक महत्व
विशेषज्ञों के अनुसार, पूरे नर्मदा पथ पर केवल तीन स्थानों—गुजरात का तिलकवाड़ा, मण्डला और ओंकारेश्वर (अब डूब क्षेत्र)—में माँ नर्मदा उत्तर की ओर प्रवाहित होती हैं। मण्डला का सौभाग्य है कि यहाँ माँ नर्मदा शहर को तीन ओर से घेरती हैं। चैत्र मास में इस क्षेत्र की परिक्रमा का महत्व वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक फलदायी माना गया है।











