हजारों पौधे, घास लगाकर बचाई सामुदायिक भूमि और जंगल

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हजारों पौधे, घास लगाकर बचाई सामुदायिक भूमि और जंगल

  • अप्रैल 2013 में शुरू की पहल, दिसम्बर 2016 में हरा हो गया जंगल, अब बन गए पेड़
  • तीन वर्ष की मेहनत ने लेंटाना के जंगल को किया समाप्त

मंडला महावीर न्यूज 29. विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन महज एक रस्म अदायगी है। भले ही इस अवसर पर बड़े-बड़े व्याख्यान दिये जाएं, हजारों पौधा-रोपण किए जाएं और पर्यावरण संरक्षण की झूठी कसमें खाई जाएं, पर इस एक दिन को छोड़ कर शेष 365 दिन प्रकृति के प्रति हमारा अमानवीय व्यवहार इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हम पर्यावरण के प्रति कितने उदासीन और हमारी संवेदना शून्य हैं। आज हमारे पास शुद्ध पेयजल का अभाव है, सांस लेने के लिए शुद्ध हवा कम पडऩे लगी है। जंगल कटते जा रहे हैं, जल के स्रोत नष्ट हो रहे हैं, वनों के लिए आवश्यक वन्य प्राणी भी विलीन होते जा रहे हैं। औद्योगीकरण ने खेत-खलिहान और वन, जंगल को निगल लिये, वन्य जीवों का आशियाना छिन गया। कल-कारखाने धुआं उगल रहे हैं और प्राणवायु को दूषित कर रहे हैं। यह सब खतरे की घंटी है। पर्यावरण संरक्षण की झूठी कसमें खाने वालों के लिए इन्द्रावन ग्राम प्रेरणा स्त्रोत है। यहां ग्रामीणों की लगन और कुछ कर गुजरने की सोच ने लेंटाना के जंगल का सफाया कर अपने ग्राम की सामुदायिक भूमि और जंगल को एक बार फिर सवांर दिया।


जानकारी अनुसार बिछिया विकासखंड के इन्द्रावन ग्राम के लोग अपनी निजी जमीनों, चरागाहों में ग्राम वनों और अन्य सामुदायिक जमीनों में लेंटाना की बढ़ती समस्या से परेशान थे। उनके पास इच्छा शक्ति तो थी लेकिन संसाधनों की कमी होने से वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। दिन-प्रतिदिन अपने संसाधनों का क्षरण होते हुए देखने के बाद भी वनवासी कुछ कर नहीं पा रहे थे। इस तरह लेंटाना का फैलाव बढऩे से न केवल उनके जंगल एवं सामुदायिक भूमि तो बर्बाद हो ही रही थी है। इसके साथ ही जंगल से मिलने वाले प्राकृतिक उत्पादों की मात्रा में भी कमी आ रही थी। मंडला में विगत कई वर्षों से कार्य कर रही एफईएस संस्था को वर्ष 2012 में जब इस मुद्दे का पता चला तो उहोने ग्राम इन्द्रावन के ग्रामीणों के साथ इस पर विस्तार से चर्चा की एवं इससे होने वाले नुकसान को समझा एवं इस मुद्दे पर कार्य करना तय किया।

विस्थापन से बदल गया जीवन और गांव 

ग्राम इन्द्रावन, जोगीसोड़ा पंचायत का वन ग्राम है। गांव में करीब 203 परिवार निवास करते हैं। जिनकी कुल जनसंख्या एक हजार के आसपास है। जिसमें अनुसूचित जनजाति परिवार 168 जिनकी कुल जनसंख्या 764 एवं अन्य पिछड़ा वर्ग परिवार की संख्या 35 एवं जनसंख्या 216 है। ग्राम की भारती पट्टा का कहना है कि पहले यह गांव कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के अंदर बसा हुआ था और इस गांव का नाम माटी गहन था। यहाँ रहने वाले लोग प्रकृति की गोद में बैठ कर प्रकृति का भरपूर आनंद व सुख प्राप्त करते थे। जंगलों से मिलने वाली लघु वनोपज जैसे मैनहर, डांग, कांदा, कड़वा कांदा, गिरसी कांदा व चांदी कांदा और विभिन्न प्रकार की जंगली भाजी एवं रोगों के उपचार के लिए जंगलों से प्राप्त जड़ी बूटी का उपयोग कर स्वस्थ्य जीवन जीते थे। कृषि योग्य भूमि एवं पर्याप्त जल संसाधन थे। मवेशी की बात करें तो प्रति परिवार के पास 10 से 20 नग गाय बैल थे। जिनसे पर्याप्त दूध, दही, घी मिलता था और उसका सेवन भी इनके द्वारा किया जाता था। उस समय इनके पास मवेशी को चराने के लिए चारागाह में विभिन्न प्रकार की घास थी। ये लोग हर तरह से संपन्न एवं संसाधनों से लवरेज थे। लेकिन सरकार द्वारा कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के विस्तारीकरण नीति के कारण गांव के विस्थापन की कहानी शुरू हो गई। इस माटीगहन गांव को सन 1972 में ग्राम जोगीसोडा एवं खलोड़ी के बीच बसाया गया। उसी समय से इस गांव का नाम बदलकर इंद्रावन ग्राम हो गया।

लेंटाना को हटाने भ्रमण कर निकाला हल 

विस्थापन के बाद ग्रामीणों का सबसे बड़ा मुद्दा था उनके सामुदायिक संसाधनों का लेंटाना के कारण क्षरीत होना और बिगडऩा। ग्राम की बैठक में पर्यावरण विकास समिति और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन समिति दोनों ने कंपार्टमेंट नंबर 1444 से लैंटाना को हटाने पर चर्चा शुरू की। इसी के आधार पर एफईएस संस्था के कार्यकर्ताओं ने इन्द्रावन की इस वन भूमि का भ्रमण किया एवं ग्रामीणों द्वारा बताये गए मुद्दों एवं समस्याओं पर भी उनकी स्पष्टता भ्रमण के बाद बढ़ गई थी एवं यह समझ में आ गया था कि लेंटाना को इस भूमि से हटाए बिना पर्यावरण संरक्षण एवं स्थानीय वनों का संरक्षण संभव नहीं हो पायेगा। इसका एक ही उपाय निकलकर सामने आया कि लेंटाना को इस भूमि से पूरी तरह से हटाया जायेगा तब ही इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।

वाद विवाद के बाद पौधारोपण की बनी सहमति 

ग्राम इंद्रावन के ग्रामीण पौधारोपण करने की तैयारी में थे, इसकी खबर जैसे ही पड़ोसी ग्राम खलोड़ी को लगी तो दोनों ग्राम के बीव विवाद हो गया। इसके बाद दोनों ग्राम के लोगों को बैठाकर समझाया गया और निर्णय लिया गया कि संबंधित शासकीय विभाग के अधिकारीयों एवं गांव के सरपंच, सचिव, पटवारी सभी को बुलाकर सभी के समक्ष निर्णय लिया जाएगा। बैठक के 2 दिन बाद सभी को आमंत्रित कर बुलाया गया। नक्शा देखकर बताया गया कि नाले के इस पार इंद्रावन और नाले के उस पार ग्राम खलोडी की जमीन है। इस पर दोनों गांव राजी हुए और तय किया गया कि लेंटाना सफाई, गड्ढा खुदाई, पौधारोपण, दोनों गांव मिलकर इस जगह पर कार्य करेंगे। दोनों गांव मिलकर घास काटेंगे। और अपनी-अपनी मवेशियों को नियंत्रण पर रखेंगे। इसके बाद कार्य शुरू किया गया।

अलग-अलग प्रजाति के पौधों से संवारा जंगल 

गाँव के लोगों ने लेंटाना हटाने के बाद इस भूमि पर कौन-कौन सी प्रजाति के पौधे लगाए जाएंगे और कितनी मात्रा में लगाये जायेंगे यह गाँव की बैठक में तय किया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि इस भूमि में सतकटा प्रजाति लगाया जाए, जिसमें आंवला, साजा, महुआ, सागौन, खमीर, करंज, बांस, जामुन, हर्रा, बहेड़ा आदि प्रजातियां के पौधों को लगाने सहमति बनी। ग्राम की बैठक में तय होने के बाद जुलाई 2013 में कम्पार्टमेंट संख्या 1444 के 18 हेक्टेयर में लैंटाना हटाने के बाद इन प्रजाति के कुल 15 हजार 500 पौधों का रोपण का कार्य किया गया। इसके दूसरे साल 5,000 पौधे उन स्थानों पर लगाये गए जहाँ पोधे मर गए थे एवं 5 किलो भौण घास का बीज सीड बाल बनाकर डाला गया। इसके अलावा आसपास से विभिन्न प्रजाति के घास जैसे भौण, कांदी, सुकरा इत्यादि के बीजों को एकत्रित कर व खरीद कर बोया गया। जिसके बाद सकारात्मक परिणाम ने सभी में उत्साह भर दिया था। यही प्रक्रिया दूसरे एवं तीसरे वर्ष भी अपनाई गई और लेंटाना जंगल की भूमि से गायब होता चला गया। अब हरा भरा जंगल बन गया है।



 

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