22 साल का इंतज़ार-महाकौशल-छत्तीसगढ़ रेल कॉरिडोर का क्या अब खत्म होगा वनवास?

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महाकौशल-छत्तीसगढ़ रेल कॉरिडोर

22 साल का इंतजार और 80 साल पुराना सपना, क्या अब खत्म होगा वनवास?

  • रेल एक्टिविस्ट ने रेलवे बोर्ड के स्पेशल क्लॉज से छिड़ी मुहिम
  • पंडरिया-मंडला-जबलपुर रेल लिंक के लिए अपडेटेड सर्वे की मांग

मंडला महावीर न्यूज 29. मध्य भारत के सबसे प्रतीक्षित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रेल मार्ग बिलासपुर-मुंगेली-पंडरिया-बिछिया-मंडला-जबलपुर को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। आदिवासी अंचल की जीवनरेखा माने जाने वाले इस रेल कॉरिडोर के लिए स्वतंत्र रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी ने रेलवे बोर्ड के ही 22 साल पुराने एक स्पेशल क्लॉज को आधार बनाकर इस ठंडी पड़ी परियोजना को पुनर्जीवित करने की मुहिम छेड़ दी है।

रेलवे का अपना वादा बना मुहिम का आधार 

ऐतिहासिक दस्तावेजों और सर्वे रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह बात सामने आई है कि वर्ष 2003-04 में जब बिलासपुर-मंडला-जबलपुर (372 किमी) लाइन का प्रारंभिक सर्वे हुआ था, तब रेलवे बोर्ड ने कम मुनाफे का हवाला देते हुए इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। लेकिन, बोर्ड के तत्कालीन आदेश (दिनांक 12.05.2004) में एक महत्वपूर्ण शर्त अंकित थी, इस परियोजना की 10 साल बाद पुन: समीक्षा की जा सकती है।
विडंबना यह है कि यह मियाद वर्ष 2014 में ही पूरी हो चुकी है, लेकिन शासन और प्रशासन स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। अब इसी रिव्यू क्लॉज के आधार पर रेल मंत्रालय से अपडेटेड ट्रैफिक सर्वे कराने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई गई है।

आरओआर 14 प्रतिशत तक पहुँचने की प्रबल संभावना 

मुहिम के पीछे सबसे सशक्त तर्क इस मार्ग की आर्थिक व्यवहार्यता है। पूर्व में राजनांदगांव-मंडला-जबलपुर (2016) के सर्वे में इस अंचल का आरओआर (+)1.73 प्रतिशत दर्ज किया गया था। वर्तमान परिस्थितियों में, चूंकि पंडरिया तक रेल विस्तार की योजना पर पहले से काम चल रहा है, इसलिए पंडरिया से बिछिया-मंडला-जबलपुर को जोडऩा अब केवल एक मिसिंग लिंक को पूरा करने जैसा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्तमान औद्योगिक, कृषि और पर्यटन विकास को देखते हुए, नए सर्वे में आरओआर 12 प्रतिशत से 14 प्रतिशत तक पहुँच सकता है, जो किसी भी राष्ट्रीय रेल परियोजना की स्वीकृति के लिए एक आदर्श मानक है।

इन स्टेशनों की बदल सकती है तकदीर 

प्रस्तावित मार्ग बिलासपुर से शुरू होकर मुंगेली, पंडरिया, मोतीनाला, बिछिया, अंजनिया, माधोपुर, नया मंडला, सागर, चिरईडोगरी, सौंधर, बीजाडांडी, परारिया और भेड़ाघाट होते हुए जबलपुर को जोड़ेगा। यह मार्ग न केवल जबलपुर और बिलासपुर जैसे दो बड़े व्यापारिक केंद्रों के बीच की दूरी को 100 किमी से अधिक कम करेगा, बल्कि विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क के समीपवर्ती क्षेत्रों और घने आदिवासी अंचलों के लिए आर्थिक समृद्धि के द्वार खोल देगा।

मंत्रालय तक पहुंची जनता की आवाज 

इस संबंध में रेल मंत्रालय में जनहित के अंतर्गत औपचारिक शिकायतें (रूह्रक्ररुङ्घ/श्व/2026/0021154 और 0021155) दर्ज कराई जा चुकी हैं। मांग स्पष्ट है कि रेलवे अपने पुराने वादे के मुताबिक तत्काल रिव्यू सर्वे के आदेश जारी करे और इसे नेशनल प्रायोरिटी कॉरिडोर के रूप में विकसित करे। स्थानीय जनता में इस बात को लेकर भी आक्रोश है कि जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) ने पिछले एक दशक में इस ओर ध्यान नहीं दिया।

निष्कर्ष 

क्या सरकार इस नर्मदा मैकलसुता भोरमदेव रेल कॉरिडोर को हरी झंडी दिखाएगी? जनता अब आश्वासनों के बजाय धरातल पर काम देखना चाहती है। यदि यह रेल लिंक जुड़ता है, तो यह मध्य भारत के आदिवासी अंचल के लिए पिछले आठ दशकों का सबसे बड़ा तोहफा होगा।

नोट

यह रिपोर्ट सार्वजनिक दस्तावेजों और रेल मंत्रालय में दर्ज औपचारिक शिकायतों पर आधारित है। अंतिम निर्णय रेलवे बोर्ड के तकनीकी सर्वे और नीतिगत फैसलों के अधीन है।


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