बंगाल में सत्ता परिवर्तन: ‘शून्य’ से ‘शिखर’ तक पहुँची भाजपा

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बंगाल में सत्ता परिवर्तन: ‘शून्य’ से ‘शिखर’ तक पहुँची भाजपा

टीएमसी के अभेद्य दुर्ग में बड़ी सेंध

  • ममता का ‘गठबंधन इतिहास’ और ‘एंटी-टीएमसी’ लहर
  • पश्चिम बंगाल की सियासत का नया अध्याय

मंडला महावीर न्यूज 29. पश्चिम बंगाल की राजनीति, जो दशकों तक वैचारिक कट्टरता और सत्ता के मजबूत ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमती रही, आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। 1977 से 2011 तक, यानी लगातार 34 वर्षों तक ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाले वामपंथी शासन ने राज्य की जड़ों पर राज किया। उस दौर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अस्तित्व बंगाल की भूमि पर लगभग नगण्य था। लेकिन आज के समीकरणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है।

राजनैतिक शून्यता और भाजपा का उदय

2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ वामपंथ के अभेद्य किले को ढहा दिया। सत्ता में आने के बाद अगले 15 वर्षों में टीएमसी ने वाम दलों के सांगठनिक ढांचे को लगभग समाप्त कर दिया। राजनीति के जानकारों का मानना है कि टीएमसी द्वारा वामपंथ को हाशिए पर धकेलने से राज्य में एक ‘राजनैतिक शून्यता’ पैदा हुई। वामपंथ के कमजोर होने से “एंटी-टीएमसी वोट” के लिए भाजपा एकमात्र सशक्त विकल्प बनकर उभरी।

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की नीति अपनाई, जिसका असर बंगाल में भी दिखा। 2014 में सीमित सफलता के बाद, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतकर भाजपा ने राज्य के मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

नैरेटिव की जंग: ‘बंगाल की बेटी’ बनाम ‘बाहरी’

2021 के चुनाव में भाजपा ने आक्रामक अभियान चलाया, लेकिन ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि और ‘बंगाली अस्मिता’ का कार्ड उन पर भारी पड़ा। टीएमसी ने ममता को “बंगाल की बेटी” के रूप में पेश किया और भाजपा को “बाहरी पार्टी” करार दिया। कन्याश्री, रूपश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं ने महिलाओं के बीच टीएमसी का एक बड़ा वोट बैंक तैयार किया, जिससे भाजपा का विजय रथ कुछ समय के लिए थम गया था।

ममता और भाजपा का पुराना नाता

आज भले ही टीएमसी और भाजपा एक-दूसरे के कट्टर विरोधी नजर आते हों, लेकिन इतिहास गवाह है कि ममता बनर्जी के उदय में भाजपा का भी सहयोग रहा है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने के बाद ममता ने वाम मोर्चे के खिलाफ भाजपा से हाथ मिलाया था।

  • वे 1999 में एनडीए सरकार में रेल मंत्री बनीं।

  • 2003 में पुनः एनडीए में शामिल होकर वाजपेयी सरकार में कोयला और खान मंत्रालय संभाला।

  • 2004 के लोकसभा और 2006 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा। यह सहयोग ही था जिसने ममता बनर्जी को बंगाल में एक कद्दावर नेता के रूप में स्थापित होने में मदद की।

2024 और केंद्रीय बलों की भूमिका

बंगाल की राजनीति हमेशा से ‘हिंसा और भय’ के साये में रही है। हालांकि, इस बार भारत निर्वाचन आयोग ने करीब ढाई लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर इस ढांचे को तोड़ने की कोशिश की। सुरक्षा के कड़े इंतजामों का नतीजा यह हुआ कि तथाकथित “स्थानीय प्रभाव” और डराने-धमकाने की राजनीति निष्प्रभावी रही, जिससे असली जनमत स्पष्ट होकर सामने आया।

सत्ता परिवर्तन के प्रमुख कारण

इस बार के चुनावी परिणामों ने यह धारणा बदल दी है कि केवल पहचान की राजनीति या सड़क पर आक्रामक विरोध ही सत्ता बचाए रखने के लिए पर्याप्त है। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि रोजगार, सुरक्षा और पारदर्शी शासन प्राथमिक आवश्यकताएं हैं।

  • वोट शेयर में बदलाव: भाजपा के वोट शेयर में करीब 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
  • टीएमसी की गिरावट: सत्ताधारी टीएमसी के वोट शेयर में लगभग 7 प्रतिशत की गिरावट आई।
  • प्रचंड जीत: भाजपा ने 200 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर बंगाल की सत्ता पर अधिकार कर लिया है।

विवाद और चुनौतियां

इस ऐतिहासिक जीत के बीच कुछ कड़वे तथ्य भी सामने आए हैं। करीब सत्ताइस लाख मतदाता मतदान प्रक्रिया से वंचित रह गए क्योंकि उनके मताधिकार से जुड़े मामले पर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट समय रहते फैसला नहीं कर सके। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

निष्कर्ष: पश्चिम बंगाल में भाजपा का यह उत्थान किसी एक कारक का नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों और बूथ स्तर तक किए गए सांगठनिक प्रयासों का परिणाम है। राज कुमार सिन्हा (बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ) के विश्लेषण के अनुसार, राज्य की राजनीति अभी भी परिवर्तनशील है। यह संघर्ष थमा नहीं है, बल्कि आने वाले समय में इसके नए और जटिल आयाम देखने को मिलेंगे।


प्रस्तुति: राज कुमार सिन्हा

(बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ)


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