आजादी के 78 साल बाद भी अधूरी 1944 की मांग
बेंगलुरु में गूँजी मंडला-जबलपुर-बिलासपुर रेल लाइन की आवाज
- नर्मदा-मैकलसुता-भोरमदेव रेल कॉरिडोर
- मध्य भारत की कनेक्टिविटी और विकास को मिलेगी नई संजीवनी
मंडला महावीर न्यूज 29. कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में रविवार, 03 मई 2026 को क्षेत्रीय रेल कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हुई. इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल मंडला और छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाली ऐतिहासिक बिलासपुर-मंडला-जबलपुर नई रेल लाइन विस्तार परियोजना रही.
यह परियोजना मात्र एक रेल लाइन नहीं, बल्कि वर्ष 1944 से लंबित एक ऐसी मांग है जिसे ब्रिटिश काल में ‘सेंट्रल इंडिया कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट’ के रूप में पहचाना गया था. इस बैठक में मंडला के प्रमुख रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी और बिलासपुर के मैकेनिकल इंजीनियर (IIT कानपुर) व रेल एक्टिविस्ट प्रदीप कुमार साहू ने इस बहुप्रतीक्षित परियोजना के तकनीकी और सामाजिक पहलुओं पर गहन मंथन किया.
ऐतिहासिक उपेक्षा और पुनरीक्षण की दरकार
बैठक के दौरान विशेषज्ञों ने इस रेल लाइन के पुराने सर्वे पर चिंता व्यक्त की. इस परियोजना का प्रारंभिक इंजीनियरिंग सह ट्रैफिक सर्वे (PETS) वर्ष 2003-04 में पूरा किया गया था. उस समय रेलवे बोर्ड ने संसाधनों की कमी और ऋणात्मक दर ((-) 5% ROR) का हवाला देकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था.
रेलवे बोर्ड के 12 मई 2004 के निर्देशों के अनुसार, इस परियोजना की समीक्षा 10 साल बाद यानी 2013-14 में होनी चाहिए थी, जो अब तक लंबित है. विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों और बढ़ते यातायात को देखते हुए यदि अब सर्वे होता है, तो ROR 12-14% तक सकारात्मक आने की पूर्ण संभावना है.
‘नर्मदा-मैकलसुता-भोरमदेव रेल कॉरिडोर’ का प्रस्ताव
रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी ने इस परियोजना को एक नई पहचान देते हुए इसे ‘नर्मदा-मैकलसुता-भोरमदेव रेल कॉरिडोर’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह नाम मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है.
नितिन सोलंकी ने कहा, “आदिवासी अंचल के लोगों की यह मांग 82 साल पुरानी है. यह कॉरिडोर न केवल पटरियों का जाल होगा, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाला सेतु बनेगा”. उन्होंने मांग की है कि रेलवे बोर्ड तत्काल अपडेटेड ट्रैफिक सर्वे (UTS) और फाइनल लोकेशन सर्वे (FLS) की स्वीकृति प्रदान करे.
दूरी में भारी कमी और आर्थिक लाभ
तकनीकी दृष्टि से यह रेल मार्ग मध्य भारत के लिए गेम-चेंजर साबित होगा:
- समय और दूरी की बचत: प्रस्तावित मार्ग से जबलपुर और बिलासपुर के बीच की दूरी लगभग 100 किमी कम हो जाएगी. वर्तमान में जबलपुर-गोंदिया-बिलासपुर मार्ग 517 किमी और जबलपुर-कटनी-बिलासपुर मार्ग 407 किमी है.
- कनेक्टिविटी: कटघोरा-उसलापुर-बिलासपुर-पंडरिया-डोंगरगढ़ लाइन को पंडरिया से जोड़ना इस क्षेत्र के लिए सबसे सटीक विकल्प साबित होगा.
- आदिवासी विकास: मंडला जैसे जनजातीय बहुल क्षेत्रों को मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार, व्यापार और उच्च शिक्षा के नए द्वार खुलेंगे.
धार्मिक और पर्यटन सर्किट को वैश्विक पहचान
यह रेल लाइन भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन और धार्मिक स्थलों को एक सूत्र में पिरोएगी:
-
माँ नर्मदा का उद्गम: अमरकंटक और नर्मदा परिक्रमा वासियों के लिए यह एक सुगम मार्ग बनेगा.
-
विश्व प्रसिद्ध स्थल: जबलपुर के भेड़ाघाट, कान्हा नेशनल पार्क, कवर्धा के ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर और बिलासपुर के रतनपुर स्थित महामाया मंदिर के बीच सीधा संपर्क स्थापित होगा. इससे क्षेत्रीय पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर नई पहचान मिलेगी.
भविष्य की रणनीति और प्रशासनिक तालमेल
IIT कानपुर के इंजीनियर प्रदीप कुमार साहू ने विश्वास व्यक्त किया कि यह लाइन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीच की ‘लाइफलाइन’ बनेगी. उन्होंने कहा कि तकनीकी कनेक्टिविटी सुदृढ़ होने से दोनों राज्यों के व्यापारिक संबंधों में क्रांतिकारी बदलाव आएगा.
परियोजना को गति देने के लिए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) और पश्चिम मध्य रेलवे (WCR) के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया है. आगामी कदम के रूप में, जल्द ही एक विस्तृत तकनीकी ड्राफ्ट और मांग पत्र रेल मंत्री, रेलवे बोर्ड, संबंधित महाप्रबंधकों (GM) और स्थानीय सांसदों व मंत्रियों को सौंपा जाएगा ताकि दशकों पुराने इस सपने को धरातल पर उतारा जा सके.












