82 साल का इंतजार होगा खत्म

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82 साल का इंतजार होगा खत्म

रेल एक्टिविस्ट के ‘मास्टरप्लान’ से रेलवे के बचेंगे ₹2500 करोड़, बोर्ड में मची हलचल

  • जबलपुर-मंडला-कवर्धा रेल लिंक
  • ₹2500 करोड़ की बचत और 10% मुनाफे का ‘मास्टरप्लान’ रेल मंत्रालय की मेज पर
  • आदिवासी अंचल में विकास की नई पटरी
  • नितिन सोलंकी के प्रस्ताव से ‘डेड-एंड’ मंडला फोर्ट बनेगा रणनीतिक जंक्शन

विशेष रिपोर्ट: विकास की पटरी और व्यवस्था की सुस्ती

मंडला महावीर न्यूज 29.  मध्य भारत के रेल इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ आने की उम्मीद जगी है। वर्ष 1944 यानी अंग्रेजी हुकूमत के जमाने से लंबित जबलपुर-मंडला-बिलासपुर रेल लाइन प्रोजेक्ट को लेकर रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी ने एक ऐसा ‘मास्टरप्लान’ तैयार किया है, जिसने रेलवे बोर्ड से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक हलचल तेज कर दी है। यह नया प्रस्ताव न केवल सरकारी खजाने के ₹2500 करोड़ बचाने का दावा करता है, बल्कि महाकौशल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों के विकास के बंद दरवाजे खोलने की क्षमता भी रखता है.

1.कठघोरा उसलापुर बिलासपुर कवर्धा होते हुए डोंगरगढ़
2.Jabalpur mandla kawardha jodkar bilaspur

मास्टरप्लान: अरबों की बचत और ‘डबल फायदा’

रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी ने रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक (PG) रत्नेश कुमार झा के समक्ष (पंजीकरण संख्या: MORLY/E/2026/0019306) आधिकारिक रूप से यह तकनीकी रोड-मैप प्रस्तुत किया है. इस मास्टरप्लान की सबसे बड़ी खूबी इसका किफायती बजट और उच्च रिटर्न है।

बचत का गणित: वर्तमान में डोंगरगढ़-कवर्धा-कटघोरा लाइन पहले से स्वीकृत है। नितिन सोलंकी का तर्क है कि 2016 के पुराने सर्वे के अनुसार राजनांदगांव-कवर्धा (135 किमी) के लिए अलग से ट्रैक बिछाने की आवश्यकता नहीं है. यदि इस हिस्से को हटाकर रूट में संशोधन किया जाए, तो सीधे ₹2500 करोड़ की बचत होगी। इस बची हुई राशि का उपयोग कवर्धा-मंडला-जबलपुर खंड के विद्युतीकरण और आधुनिकीकरण में किया जा सकता है.

तकनीकी रिपोर्ट: मुनाफे का पावरहाउस (10% ROR)

प्रस्ताव में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, लागत घटने से इस प्रोजेक्ट का ‘रेट ऑफ रिटर्न’ (ROR) जो पहले मात्र 1.73% था, वह बढ़कर 8% से 10% तक पहुँच जाएगा. रेलवे बोर्ड के मानकों के अनुसार, 10% ROR वाला प्रोजेक्ट ‘अत्यधिक मुनाफे’ की श्रेणी में आता है।

इंजीनियरिंग की विशेषताएं:

  • दूरी और गति: यह मार्ग लगभग 295-300 किमी लंबा होगा, जिसे 130 किमी/घंटा की गति के लिए डिजाइन किया जाएगा.
  • पुल और सुरंग: इस चुनौतीपूर्ण मार्ग पर 16 सुरंगें प्रस्तावित हैं, जिनमें से एक की लंबाई 7.9 किमी होगी। साथ ही, 35 से 40 बड़े पुलों का निर्माण किया जाएगा.
मंडला का विकसित टर्मिनल स्टेशन के साथ ही जंक्शन के साथ उभरता मंडला की नई तस्वीर.

हावड़ा-मुंबई रूट में आएगी क्रांति: 5 बड़े फायदे

यह नया रेल कॉरिडोर ‘नर्मदा-महानदी’ रेल लिंक के रूप में पहचाना जाएगा, जिसके बनने से क्षेत्र को पाँच प्रमुख लाभ होंगे:

  • सबसे छोटा वैकल्पिक मार्ग: यह बिलासपुर को सीधे जबलपुर से जोड़ेगा, जिससे हावड़ा से मुंबई के बीच की दूरी कम होगी और यात्रा के समय में 3 से 4 घंटे की बचत होगी.
  • ट्रैफिक दबाव में कमी: वर्तमान बिलासपुर-रायपुर-नागपुर रूट पर मालगाड़ियों का भारी दबाव रहता है। इस नए मार्ग से ट्रैफिक डायवर्ट होने पर ट्रेनों की लेटलतीफी कम होगी.
  • कोयला परिवहन में सुगमता: छत्तीसगढ़ के कोरबा-बिलासपुर बेल्ट से कोयला सीधे उत्तर भारत के पावर प्लांट्स तक कम लागत और समय में पहुँच सकेगा.
  • मजबूत क्षेत्रीय संपर्क: ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आने वाले यात्री बिना किसी बड़े घुमाव के सीधे महाकौशल और उत्तर भारत के राज्यों से जुड़ सकेंगे.
  • मंडला फोर्ट का जंक्शन के रूप में उदय: अभी मंडला फोर्ट एक ‘डेड-एंड’ या आखिरी स्टेशन है। इस प्रोजेक्ट के बाद यह एक ‘रणनीतिक जंक्शन’ बन जाएगा, जहाँ बिलासपुर और जबलपुर की दिशाओं से आने वाली ट्रेनों का संगम होगा.

कान्हा नेशनल पार्क और पर्यटन को अंर्तराष्ट्रीय पंख

यह नया एलाइनमेंट कवर्धा-बिछिया-अंजनिया-मंडला-जबलपुर मार्ग से होकर गुजरेगा। यह सीधा मार्ग विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क को अंर्तराष्ट्रीय रेलवे कनेक्टिविटी प्रदान करेगा, जिससे पर्यटन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएगा और स्थानीय रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

PMO के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ प्रस्ताव

नितिन सोलंकी के अनुसार, यह प्रस्ताव अब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है. उन्होंने कहा, “भले ही हालिया ‘मन की बात’ में समय की कमी से इसका उल्लेख न हुआ हो, लेकिन रिकॉर्ड में जानकारी दर्ज होना एक बड़ी जीत है। अब सरकार के पास यह पुख्ता जानकारी है कि कैसे थोड़े से सुधार से ₹2500 करोड़ बचाए जा सकते हैं”.

एक्टिविस्ट की मांग: तुरंत हो SFLS सर्वे

नितिन सोलंकी ने रेल मंत्रालय से मांग की है कि इस किफायती और मुनाफे वाले रूट के लिए तुरंत ‘सप्लीमेंट्री फाइनल लोकेशन सर्वे’ (SFLS) के आदेश दिए जाएं. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई सिर्फ रेल की नहीं, बल्कि मंडला के सम्मान और आदिवासी अंचल के हक की है।

निष्कर्ष: जब बचत और मुनाफा दोनों स्पष्ट हैं, तो देरी का कोई तर्क नहीं बचता। अब देखना यह है कि रेल मंत्रालय इस ‘मास्टरप्लान’ पर कितनी जल्दी मुहर लगाता है ताकि 82 सालों का यह लंबा इंतजार हकीकत में बदल सके.



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