मंडला में जल-जंगल-जमीन पर माफिया का कब्जा

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खैरो टोला में रेत माफिया का तांडव

प्रशासन मौन, पुलिस का कवच और धूल के गुबार में दफन आदिवासियों का अधिकार

  • मंडला में जल-जंगल-जमीन पर माफिया का कब्जा
  • स्कूल बंद, रास्ते ध्वस्त और शिकायतों के बाद ग्रामीणों को मिल रही धमकियां

मंडला महावीर न्यूज 29. आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत गुरारखेड़ा का ग्राम खैरो टोला इन दिनों रेत माफियाओं का दादागिरी का अखाड़ा बन चुका है। पिछले लगभग दो माह से मां नर्मदा के सीने को चीरकर मशीनों के जरिए रेत का उत्खनन धड़ल्ले से जारी है। माफिया की मशीनें न केवल नदी, बल्कि ग्रामीणों की निजी जमीनों और वन विभाग की सुरक्षित भूमि को भी अपनी जागीर समझकर रौंद रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि जिस मुख्य मार्ग से रेत से लदी भारी गाडिय़ां गुजरती हैं, वह गांव का इकलौता मुख्य रास्ता है। रेत माफियाओं की बेतहाशा आवाजाही ने सड़क को इस कदर ध्वस्त कर दिया है कि वहां पैदल चलना भी दूभर है। आलम यह है कि सड़क पर घुटनों तक धूल जमा हो गई है। इसी मार्ग पर बच्चों का प्राथमिक स्कूल स्थित है, लेकिन भारी वाहनों के डर और धूल के कारण बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। अभिभावकों को डर है कि किसी भी दिन कोई अप्रिय घटना घट सकती है। यदि कोई गंभीर बीमार हो जाए, तो गांव में एम्बुलेंस का प्रवेश करना भी अब असंभव हो चुका है।

पुलिस और प्रशासन की संदिग्ध भूमिका 

हैरानी की बात यह है कि जब ग्रामीण एकजुट होकर इन गाडिय़ों को रोकने का प्रयास करते हैं, तो हिरदेनगर पुलिस चौकी का प्रशासन माफियाओं के बैक सपोर्ट में खड़ा नजर आता है। पुलिस माफिया पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टा ग्रामीणों को ही डरा-धमका कर पीछे हटने पर मजबूर कर देती है। ग्रामीणों ने इस संबंध में मंडला कलेक्टर, माइनिंग ऑफिसर हितेश बिसेन और फॉरेस्ट रेंजर लतिका तिवारी को साक्ष्यों और लोकेशन के साथ सूचना दी, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिला। अब स्थिति यह है कि अधिकारियों ने ग्रामीणों के फोन उठाना तक बंद कर दिया है।

सीएम हेल्पलाइन की गोपनीयता पर सवाल 

पीडि़त ग्रामीणों ने जब सीएम हेल्पलाइन 181 पर शिकायत दर्ज कराई, तो वहां से समाधान होने के बजाय एक नई मुसीबत शुरू हो गई। शिकायत के तुरंत बाद ग्रामीणों के पास रेत माफियाओं के फोन आने लगे और उन्हें धमकाया जाने लगा। ग्रामीणों का सवाल है कि जब शिकायत अधिकारियों और सरकारी पोर्टल पर की गई, तो उनका निजी नंबर माफियाओं तक कैसे पहुँचा? क्या प्रशासन और माफिया के बीच कोई गहरा गठजोड़ काम कर रहा है?

नियमों को ताक में रख कर रहे मशीन से उत्खनन 

कानूनी रूप से रेत उत्खनन पूर्णत: अवैध नहीं हो सकता, लेकिन नियमों के मुताबिक मशीनों को लगाकर नदी का स्वरूप बिगाडऩा और निजी खेतों में जबरन मुरूम डालकर रास्ता बनाना सरासर गलत है। माफिया किसानों के खेतों को अपनी संपत्ति समझकर फसलों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। केंद्र और राज्य में जल-जंगल-जमीन की रक्षा का दावा करने वाली भाजपा सरकार के राज में आदिवासियों के साथ हो रहा यह अन्याय कई सवाल खड़े करता है।

सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग 

ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन को खुली चुनौती दी है कि यदि यह उत्खनन वैध है, तो विभाग प्रेस कॉन्फ्रेंस करके नियमों की फोटो सार्वजनिक करें और बताएं कि किस नियम के तहत गांव की सड़कों और बच्चों के भविष्य को बर्बाद करने की अनुमति दी गई है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही मशीनी उत्खनन बंद नहीं हुआ और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो वे जिला मुख्यालय का घेराव करने के लिए मजबूर होंगे।



 

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