सनातन संस्कृति के उद्धारक आदि गुरु शंकराचार्य
- सनातन संस्कृति के उद्धारक, आदि गुरु शंकराचार्य की 1238वीं जयंती पर विशेष नमन
- अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य बिखरते भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया
मंडला महावीर न्यूज 29। भारतीय दर्शन के सूर्य और सनातन धर्म के पुनर्जागरण के शिल्पी आदि गुरु शंकराचार्य की 1238वीं जयंती इस वर्ष श्रद्धापूर्वक मनाई जा रही है। मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने न केवल धर्म और दर्शन को नई दिशा दी, बल्कि खंडित हो रही भारतीय संस्कृति को पुनः एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक कार्य किया।
बताया गया कि दक्षिण भारत के नंबूदरी ब्राह्मण वंश में जन्मे बालक शंकर की प्रतिभा असाधारण थी। परंपरा के अनुसार, उन्होंने मात्र 8 वर्ष की आयु में चारों वेदों का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था। बाल्यकाल में ही संन्यास ग्रहण कर उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। उनकी विरासत आज भी जीवित है। उत्तराखंड स्थित भगवान बद्रीनाथ के मंदिर में आज भी नंबूदरी ब्राह्मणों द्वारा ही पूजा का विधान है, जो शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा का हिस्सा है।

अद्वैत वेदांत और सांस्कृतिक एकता
बताया गया कि जिस समय हिंदू संस्कृति पतन की ओर अग्रसर थी, उस समय शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को स्थापित किया। उन्होंने उद्घोष किया कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। उनके दर्शन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं। मोह में फंसा मनुष्य स्वप्न के समान है, जो अज्ञान तक ही सत्य लगता है। सबसे बड़ा तीर्थ मन की शुद्धि है। आत्मा शरीर, इंद्रियों और बुद्धि से परे केवल एक साक्षी स्वरूप है।
चार पीठों की स्थापना, धार्मिक एकता का स्तंभ
देश की अखंडता को बनाए रखने के लिए उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख पीठों की स्थापना की। ये पीठ आज भी सनातन धर्म के सर्वोच्च केंद्र और धार्मिक एकता के प्रतीक माने जाते हैं। जिसमें उत्तर दिशा के बद्रीनाथ (उत्तराखंड) में ज्योतिर्मठ पीठ, दक्षिण दिशा के चिकमगलूर (कर्नाटक) में श्रृंगेरी शारदा पीठ, पूर्व दिशा के पुरी (ओडिशा) में गोवर्धन पीठ और पश्चिम दिशा के द्वारका (गुजरात) में द्वारका शारदा पीठ है।
जयंती का महत्व
आदि शंकराचार्य की जयंती प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन न केवल एक दार्शनिक के स्मरण का है, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने के संकल्प का भी है। आज के आधुनिक युग में भी उनके विचार सामाजिक समरसता और आत्मिक शांति के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।











