बायो-फार्मा शक्ति पहल पर उठे सवाल
क्या आदिवासियों और ग्रामीणों तक पहुँचेगा इसका लाभ
- केंद्रीय स्वास्थ्य बजट और बायो-फार्मा शक्ति, एक जमीनी विश्लेषण
मंडला महावीर न्यूज 29. केंद्रीय स्वास्थ्य बजट 2026-27 में घोषित बायो-फार्मा शक्ति पहल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अगले पांच वर्षों में 10 हजार करोड़ रुपये के निवेश के साथ भारत को वैश्विक बायोफार्मा विनिर्माण केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इस महत्वाकांक्षी योजना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने बजट के उन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया है जो ग्रामीण और जनजातीय भारत को सीधे प्रभावित करते हैं।
राज कुमार सिन्हा का कहना है कि बायो-फार्मा शक्ति पहल को उच्च-तकनीक, निर्यात और फार्मा उद्योग के नजरिए से देखा जा रहा है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या यह पहल केवल शहरी-कॉरपोरेट स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करेगी या इसका लाभ आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों तक भी पहुंचेगा? उन्होंने आशंका व्यक्त की कि यदि कोल्ड-चेन, स्टोरेज और प्रशिक्षित स्टाफ जैसी बुनियादी सुविधाएं ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित नहीं की गईं, तो इन आधुनिक दवाओं का लाभ केवल शहरों तक ही सिमट कर रह जाएगा।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य चुनौतियां
टिप्पणी में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत के आदिवासी इलाकों में आज भी टीबी, सिकल सेल, मलेरिया और कुपोषण जैसी बीमारियां व्यापक हैं। इसके साथ ही अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी कैंसर और डायबिटीज जैसे रोग बढ़ रहे हैं। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य समस्या केवल बीमारी नहीं, बल्कि उपलब्धता, लागत और दूरी की भी है। वर्तमान में फार्मा आर एंड डी का मुख्य फोकस शहरी-मध्यवर्गीय बीमारियों पर है, जिससे ग्रामीण बीमारियों की अनदेखी होती है।
समन्वय की आवश्यकता
राज कुमार सिन्हा ने कहां है कि यदि बायो-फार्मा शक्ति का समन्वय ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के साथ नहीं हुआ, तो यह पहल सांस्कृतिक और व्यावहारिक रूप से असंगत साबित हो सकती है। जनजातीय क्षेत्रों में महंगी दवाओं का सरकारी योजनाओं में शामिल होना और उनकी जमीनी स्तर पर उपलब्धता सुनिश्चित करना ही इस बजट की वास्तविक सफलता होगी।











