आर्थिक तंगी को मात देकर लखपति बनीं सवनी बाई
मशरूम और मुर्गी पालन से संवारी परिवार की तकदीर
- आजीविका मिशन से जुड़कर 50 हजार से 1.50 लाख तक पहुँचा आय का सफर
- अब सवनी बाई दूसरी महिलाओं को दे रहीं ट्रेनिंग
मंडला महावीर न्यूज 29. दृढ़ इच्छाशक्ति, सही मार्गदर्शन और कड़ी मेहनत हो, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता के नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं। इस बात को सच साबित कर दिखाया है विकासखंड नारायणगंज के ग्राम गढ़ार की निवासी श्रीमती सवनी बाई ने। कभी अत्यधिक आर्थिक तंगी और सीमित साधनों के बीच अपने छह सदस्यीय परिवार का भरण-पोषण करने वाली सवनी बाई आज न केवल आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं, बल्कि अपने क्षेत्र की दर्जनों अन्य महिलाओं के लिए सशक्तिकरण की एक बड़ी मिसाल भी बनकर उभरी हैं। आजीविका के नए और वैज्ञानिक मॉडलों को अपनाकर उन्होंने अपनी आय में जबरदस्त इजाफा किया है।
सीमित आय में परिवार चलाना था बड़ी चुनौती
मात्र 8वीं कक्षा तक शिक्षित सवनी बाई का जीवन कुछ वर्षों पहले तक बेहद संघर्षपूर्ण था। उनके पति सुकल सिंह कुलस्ते मुख्य रूप से केवल पारंपरिक खेती-किसानी पर निर्भर थे। पारंपरिक तरीकों और सीमित संसाधनों से होने वाली इस खेती से परिवार की कुल वार्षिक आय 50 हजार रुपए से भी कम हो पाती थी। इतनी कम आमदनी में छह सदस्यों वाले बड़े परिवार की दैनिक जरूरतें पूरी करना, भरण-पोषण करना और बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च उठाना उनके लिए एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था।
आजीविका मिशन और प्रदान संस्था से मिला नया रास्ता
सवनी बाई के जीवन में सकारात्मक बदलाव के उस नए अध्याय की शुरुआत तब हुई, जब वे मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन नारायणगंज के संपर्क में आईं। मिशन की प्रेरणा से उन्होंने ज्योति महिला आजीविका समूह की सदस्यता ली और आगे चलकर अपनी सक्रियता व लगन के दम पर एकता ग्राम संगठन की अहम सदस्य बन गईं। इस दौरान आजीविका मिशन और सहयोगी संस्था प्रदान के माध्यम से उन्हें विभिन्न आय अर्जन गतिविधियों और कौशल विकास का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रशिक्षण ने उनके भीतर छिपे आत्मविश्वास को जगाया। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वह केवल पारंपरिक खेती के भरोसे नहीं रहेंगी।
सवनी ने लिखी सफलता की इबारत
सवनी बाई ने वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर मुख्य रूप से तीन आजीविका मॉडल शुरू किए थे। जिसमें मशरूम, मुर्गी पालन और जैविक खेती। सवनी ने महज 3 हजार रुपये की शुरुआती लागत से मशरूम उत्पादन की शुरुआत की। इसमें से केवल 1500 रूपए की लागत से बैग्स तैयार किए गए। वैज्ञानिक तरीके से 15-15 दिनों के अंतर से मशरूम की हार्वेस्टिंग कर उसे स्थानीय बाजार में बेचना शुरू किया। इस छोटी सी शुरुआत ने उन्हें 10 से 15 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी देना शुरू कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने मुर्गी पालन में 10 से 15 हजार रुपए के निवेश के साथ व्यवस्थित रूप से मुर्गी पालन का व्यवसाय भी शुरू किया। उचित देखभाल के चलते वर्तमान में वे इस गतिविधि से प्रतिवर्ष लगभग 30 हजार रुपये की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं। इसके साथ ही सवनी अपने खेत के एक हिस्से में उन्होंने दैनिक उपयोग की मौसमी सब्जियों का जैविक तरीके से उत्पादन शुरू किया। इससे उनके परिवार को पौष्टिक और विष-मुक्त भोजन तो मिल ही रहा है, साथ ही बची हुई सब्जियों की बाजार में बिक्री से वर्षभर निरंतर आय आ रही है।
सालाना आय 1.50 लाख हुई, बच्चें हुए शिक्षित
इन सभी सटीक प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि जो परिवार कभी 50 हजार रुपए की वार्षिक आय में गुजर-बसर करने को मजबूर था, आज उस परिवार की कुल वार्षिक आय बढ़कर लगभग 1.50 लाख रुपये हो चुकी है। इस आर्थिक मजबूती के दम पर सवनी बाई ने अपने सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा दी। सवनी का एक बेटा और तीन बेटियां है। वे अपनी बेटियों को भी उच्च शिक्षा प्रदान कर रही हैं।
अब मास्टर ट्रेनर बनकर दिखा रहीं दूसरों को राह
आज सवनी बाई का ज्ञान और अनुभव इतना समृद्ध हो चुका है कि वे स्वयं एक मास्टर ट्रेनर की भूमिका निभा रही हैं। वे क्षेत्र के अन्य किसानों और ग्रामीण महिलाओं के बीच जाकर उन्हें मशरूम उत्पादन और मुर्गी पालन का तकनीकी प्रशिक्षण दे रही हैं। एक आम महिला से सफल उद्यमी और फिर मास्टर ट्रेनर बनने तक का उनका यह सफर अद्भुत है। सवनी बाई ने प्रमाणित कर दिया है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही अवसर और दृढ़ संकल्प का साथ मिले, तो वे न केवल अपने परिवार का भविष्य संवार सकती हैं, बल्कि समाज के लिए एक मजबूत प्रेरणास्त्रोत बन सकती हैं।









