कागजी योजनाओं के कारण महानगरों की ओर भटकने को मजबूर शिक्षित बेरोजगार
अपनों की जमीन पर बेगाने हो रहे युवा
- रोजगार के अभाव में मंडला के आदिवासी अंचल से रिकॉर्ड पलायन
- वनोपज का गढ़ होने के बावजूद उद्योग शून्य
मंडला महावीर न्यूज 29. सतपुड़ा और नर्मदा की गोद में बसा, प्राकृतिक संसाधनों और वनोपज से समृद्ध मंडला जिला इन दिनों युवाओं के बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन का दंश झेल रहा है। डिग्रीधारी स्नातकों से लेकर तकनीकी रूप से कुशल और अकुशल आदिवासी युवा तक, हर कोई आजीविका की तलाश में अपने घर-परिवार को छोड़कर दिल्ली, चेन्नई, नागपुर, भोपाल, हैदराबाद और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों की ओर रुख करने को मजबूर है।
संसाधनों से भरपूर, फिर भी खाली हाथ
मंडला जिला वनोपज (महुआ, टोला, हर्रा, बहेड़ा, आंवला, गोंद, तेंदूपत्ता) और कोदों-कुटकी जैसे पौष्टिक मोटे अनाजों का प्रमुख केंद्र है। इसके बावजूद, जिले में एक भी बड़ा वनोपज प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) केंद्र या फूड पार्क स्थापित नहीं किया गया है। स्थानीय आदिवासी दिन-रात मेहनत कर वनोपज जुटाते हैं, लेकिन प्रोसेसिंग सुविधाएं न होने के कारण इसे बिचौलियों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ता है। यदि जिले में ही पैकेजिंग और वैल्यू एडिशन की इकाइयां लगें, तो हजारों युवाओं को स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक रोजगार मिल सकता है।
उच्च शिक्षा के बाद अनिश्चित भविष्य और सफर की मार
बिछिया, नैनपुर, घुघरी, मवई और मोहगांव जैसे ब्लॉकों से हर साल सैकड़ों युवा डिग्रियां लेकर निकलते हैं। लेकिन जिले में कल-कारखानों और कंपनियों के अभाव में उन्हें शहरों में जाकर कम वेतन पर काम करना पड़ता है। ऊपर से सीधी और किफायती रेल कनेक्टिविटी न होने के कारण युवाओं को निजी बसों का मनमाना किराया चुकाना पड़ता है, जिससे उनकी कमाई और बचत का बड़ा हिस्सा सफर में ही खर्च हो जाता है।
रोजगार मेलों और सरकारी योजनाओं की हकीकत
शासन-प्रशासन के कौशल विकास और रोजगार मेलों के दावे धरातल पर दम तोड़ रहे हैं। मेलों में आने वाली कंपनियां दूसरे राज्यों में मात्र 8,000 से 10,000 रुपये प्रति माह की नौकरी देती हैं, जो महानगरों में जीवन यापन के लिए नाकाफी है। वहीं, स्वरोजगार योजना के तहत बैंकों की जटिल लोन प्रक्रिया और गारंटरों की मांग के कारण गरीब आदिवासी युवा अपना व्यवसाय भी शुरू नहीं कर पाते हैं।
विशेष रोजगार नीति की दरकार
क्षेत्रीय विशेषज्ञों और समाजसेवियों का मानना है कि इस पलायन को रोकने के लिए सरकार को ‘आदिवासी अंचल विकास एवं रोजगार नीति’ लानी होगी। इसके तहत प्रत्येक ब्लॉक में वनोपज आधारित क्लस्टर बनाने, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से सटे होने के कारण इको-टूरिज्म (होम-स्टे, गाइड) विकसित करने और लघु व कुटीर उद्योगों (बांस कला, मिट्टी के बर्तन) को बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है। यदि समय रहते स्थानीय स्तर पर रोजगार के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह पलायन भविष्य में एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले लेगा।









