संपादकीय: बदलते भारत में दीपावली का वास्तविक प्रकाश

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संपादकीय

बदलते भारत में दीपावली का वास्तविक प्रकाश

  • बदलते भारत की दीपावली: समरसता, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण उत्थान के संकल्प का पर्व
  • सिर्फ घरों को ही नहीं, किसानों और वंचितों के भविष्य को भी रोशन करने का नाम है ‘सच्ची दीपावली’

मंडला महावीर न्यूज 29. दीपावली महज दीप जलाने, घर सजाने या उत्सव मनाने का पर्व नहीं है। यह अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और अभाव से समृद्धि की ओर निरंतर बढ़ते रहने का एक सांस्कृतिक संकल्प है। बदलते भारत के परिदृश्य में दीपावली का अर्थ और भी व्यापक हो गया है। आज यह पावन अवसर हमें आत्ममंथन करने का संदेश देता है कि बीते वर्षों में हमने समाज और राष्ट्र के रूप में विकास की कितनी दूरी तय की है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा भारत गढ़ रहे हैं।

पिछले कुछ दशकों में भारत ने गरीबी उन्मूलन, बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय समावेशन और ग्रामीण आजीविका के क्षेत्र में युगांतकारी परिवर्तन देखे हैं। करोड़ों लोगों का बहुआयामी गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आना केवल सरकारी नीतियों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे समाज, उद्यमियों, किसानों, स्वयंसेवी संस्थाओं, मातृशक्ति, युवाओं और स्थानीय समुदायों के साझा प्रयासों की सबसे बड़ी भूमिका है। विकास की नींव तभी स्थायी होती है, जब समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी उसका समान रूप से भागीदार और लाभार्थी बने।

हिमालय की दुर्गम चोटियों से लेकर मध्य भारत के वनांचलों और पूर्वोत्तर के दूरस्थ गांवों तक, भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का दर्शन अद्भुत है। बीते दशकों की राष्ट्र-यात्रा ने यह सिद्ध किया है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता के भीतर गुंथी हुई वह अटूट एकता है, जो हर चुनौती में देश को संबल देती है।

आज समाज के भीतर एक सकारात्मक और ऊर्जावान बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर देशवासी अब साझा विकास, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सहभागिता की भावना के साथ कदमताल कर रहे हैं। समय की मांग है कि यह परिवर्तन केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे दैनिक व्यवहार, संस्थागत कार्यप्रणाली और गांवों की सामूहिक कार्यसंस्कृति का अभिन्न अंग बने।

विवेक जैन

आगामी तीन दशकों में भारत के सामने विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के शिखर पर पहुंचने का सुनहरा अवसर है। इसके साथ ही ऊर्जा उत्पादन, उन्नत कृषि, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग में हमें नई ऊंचाइयां छूनी हैं। हमारे खेतों में पैदा होने वाले अनाज, फल, फूल, मसाले और वनोपज दुनिया के हर कोने तक पहुंचें। देश का अन्नदाता केवल उत्पादनकर्ता की भूमिका तक सीमित न रहे, बल्कि वह वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) का एक सशक्त और सम्मानित भागीदार बने। हमारे गांव अब केवल निवास स्थान न रहें, बल्कि रोजगार, उद्यमिता, नवाचार और समृद्धि के नए केंद्र बनकर उभरें।

इस लक्ष्य को साधने के लिए तकनीक के साथ पारंपरिक ज्ञान, बाजार के साथ किसान, उद्योग के साथ गांव और आर्थिक विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन का अद्भुत तालमेल बिठाना होगा। विकास का वास्तविक पैमाना केवल अर्थव्यवस्था का आकार या आंकड़े नहीं हो सकते। सच्ची सफलता इस बात में निहित है कि हमारे गांवों में कितने परिवार सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं, और कितने युवाओं को पलायन के बजाय अपने ही क्षेत्र में रोजगार के उत्कृष्ट अवसर मिल रहे हैं।

आइए, इस दीपावली हम केवल अपने घरों के आंगन में दीप न जलाएं, बल्कि किसी किसान के जीवन में बेहतर बाजार की उम्मीद, किसी बच्चे के भविष्य में शिक्षा का उजाला, किसी महिला के हाथों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और किसी गांव में रोजगार का नया रास्ता भी रोशन करें।

दीपावली का सच्चा प्रकाश तभी अपनी सार्थकता सिद्ध करेगा, जब वह किसी एक घर की देहरी तक सीमित न रहकर हर गांव, हर परिवार और हर व्यक्ति के जीवन के अंधकार को मिटाएगा। यही समरस, समृद्ध, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का असली संकल्प है, और यही बदलते भारत में दीपावली का वास्तविक संदेश है।


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