चार वर्षीय दुर्गेश ने रचा इतिहास, जीता गोल्ड मेडल

चार वर्षीय दुर्गेश ने रचा इतिहास

10वीं राष्ट्रीय फ्लाइंग किक स्पोर्ट्स प्रतियोगिता में जीता गोल्ड मेडल

  • आदिवासी अंचल के नन्हे खिलाड़ी ने जबलपुर महापौर कप में गाड़े झंडे
  • चाचा व कोच झामसिंह के मार्गदर्शन में पाई स्वर्णिम सफलता

मंडला महावीर न्यूज 29. कहा जाता है कि यदि प्रतिभा को सही उम्र में उचित मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और परिवार का भरपूर सहयोग मिले, तो सफलता के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। इस बात को मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले मंडला के महज चार साल के नन्हे खिलाड़ी दुर्गेश तेकाम ने सच कर दिखाया है। दुर्गेश ने अपनी अद्भुत खेल प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए जबलपुर में आयोजित महापौर कप 10वीं राष्ट्रीय फ्लाइंग किक स्पोर्ट्स प्रतियोगिता 2026 में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है और पूरे मंडला जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है।

जबलपुर में दिखाया अपनी प्रतिभा का दम 

जानकारी अनुसार जबलपुर के रानीताल स्थित बैडमिंटन हॉल में विगत दिवस महापौर कप 10वीं राष्ट्रीय फ्लाइंग किक स्पोर्ट्स प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इस राष्ट्रीय स्तर की खेल स्पर्धा में विभिन्न क्षेत्रों से आए खिलाडिय़ों ने हिस्सा लिया। लेकिन इन सबके बीच मंडला नारायणगंज के बरगी बांध विस्थापित ग्राम पिंडरई के 4 वर्षीय दुर्गेश तेकाम ने अपनी चपलता, फुर्ती और बेहतरीन फ्लाइंग किक के कौशल से निर्णायकों और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इतनी कम उम्र में उनकी यह स्वर्णिम उपलब्धि वर्तमान में पूरे खेल जगत और अंचल में चर्चा का विषय बनी हुई है।

चाचा झामसिंह तेकाम बने गुरु और मार्गदर्शक 

दुर्गेश की इस ऐतिहासिक और स्वर्णिम सफलता के पीछे उनके चाचा और मुख्य कोच झामसिंह तेकाम का अहम योगदान है। दुर्गेश को बचपन से ही उनके संरक्षण में कड़ा प्रशिक्षण मिल रहा है। कोच झामसिंह तेकाम ने इस नन्हे खिलाड़ी के भीतर छिपी खेल की बारीकियों को पहचाना और उसे छोटी उम्र से ही खेल के प्रति रुचि, अनुशासन और नियमित अभ्यास की दिशा में प्रेरित किया। दुर्गेश की यह सफलता केवल एक पदक जीतने की कहानी भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सार्थक प्रयास का परिणाम है, जिसमें परिवार का अटूट स्नेह, गुरु का सटीक मार्गदर्शन और एक नन्हे खिलाड़ी की लगन एक साथ झलकती है।

आदिवासी अंचल से राष्ट्रीय मंच तक का सफर 

मंडला जैसे आदिवासी एवं ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय पटल पर स्वर्ण पदक जीतना अपने आप में एक बड़ी और गौरवशाली उपलब्धि है। सीमित संसाधनों के बीच ग्रामीण बच्चों को खेल से जोडऩा और उन्हें ऐसी उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। दुर्गेश तेकाम की यह जीत आदिवासी समाज और ग्रामीण क्षेत्रों के उन हजारों बच्चों के लिए एक मजबूत प्रेरणा है, जिनके भीतर अपार खेल प्रतिभा तो छिपी है, लेकिन जिन्हें सिर्फ एक सही मंच और उचित अवसरों की दरकार है।

भविष्य के लिए एक नई शुरुआत 

महज चार साल के नन्हे कदम ने यह साबित कर दिया है कि खेलों में सफलता की नींव बचपन से ही रखी जा सकती है। सुरक्षित अभ्यास, निरंतर प्रोत्साहन और सही दिशा मिलने पर बच्चे बड़े चमत्कार कर सकते हैं। कोच झामसिंह तेकाम के लिए भी यह दोहरी खुशी और गर्व का क्षण है, क्योंकि उनके द्वारा तराशी गई एक ग्रामीण प्रतिभा ने राष्ट्रीय पटल पर अपनी चमक बिखेरी है। अंचल के खेल प्रेमियों, समाजसेवियों और स्थानीय नागरिकों ने इस नन्हे स्वर्ण पदक विजेता को उनकी इस शानदार उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी हैं। दुर्गेश की इस सफलता ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रतिभा गांवों में भी बसती है, उसे बस सही अवसर की आवश्यकता है।


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