महालक्ष्मी व्रत की तैयारियों को लेकर बाजार गुलजार
घर-घर बंधेंगे फुलेहरा, पति व पुत्र की दीर्घायु के लिए महिलाएं करेंगी गजलक्ष्मी की आराधना
- महालक्ष्मी पर्व के लिए बाजार में उमड़ी रौनक
- जमकर बिके मिट्टी के हाथी और कमल के फूल
मंडला महावीर न्यूज 29. जिले भर में आज 4 अक्टूबर को माता महालक्ष्मी का पावन पर्व पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। पर्व को लेकर शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक के बाजारों में रौनक देखने को मिल रही है। पूजन सामग्री, मिट्टी के हाथी और कमल के फूलों की खरीदारी के लिए दुकानों पर महिलाओं की भीड़ देखी गई।
महालक्ष्मी पर्व के चलते बाजारों में पूजन सामग्रियों की भरमार है। इस व्रत में मिट्टी से बने हाथी की पूजा का विशेष महत्व होने के कारण बाजार में आकर्षक मिट्टी के हाथियों की खूब बिक्री हुई। इसके साथ ही विभिन्न स्थानों से बिकने आए कमल के फूलों की भी भारी मांग रही। कमल माता महालक्ष्मी का आसन माना जाता है, जिसके चलते बाजार में एक कमल का फूल 15 से 20 रुपये तक में बिका।
फुलेहरा की छांव में होगी आराधना, गूंजेंगे देवी गीत
आज महिलाएं निर्जला व्रत धारण कर घर-घर फुलेहरा की छांव के नीचे मिट्टी के हाथी और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजन-अर्चन करेंगी। सुबह से लेकर देर शाम तक पूजन-पाठ का दौर चलेगा। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले देवी गीतों और रात्रि जागरण व भजन-कीर्तन से समूचा वातावरण धर्ममय हो जाएगा। अगले दिन प्रात: काल पूजन के पश्चात विसर्जन किया जाएगा।
16 बार दूबी से स्नान का है विधान
पूजा के विधान को लेकर निवास के ग्राम पिपरिया निवासी चांदनी चौकसे ने बताया कि यह व्रत पति एवं पुत्र की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। इस पर्व में 16 दिन पूर्व से ही दूबी से स्नान करने की परंपरा है, लेकिन यदि कोई महिला प्रतिदिन यह विधान नहीं कर पाती है, तो व्रत वाले दिन ही दूबी से 16 बार स्नान कर पूजन किया जाता है।
माता के गज पर सवार होकर आने की है मान्यता
शास्त्रों में उल्लेख है कि महालक्ष्मी व्रत में महादेवी गज पर सवार होकर भक्तों के द्वार पहुंचती हैं। लोककथा के अनुसार प्राचीन काल में एक राजा की दो रानियां थीं। बड़ी रानी के अनेक पुत्रों ने मिट्टी का विशाल हाथी बनाकर अपनी मां को पूजन के लिए दिया, जिससे वंचित रहने पर छोटी रानी उदास हो गईं। मां को उदास देख छोटी रानी का इकलौता पुत्र इंद्रलोक से ऐरावत हाथी मांग लाया। छोटी रानी ने ऐरावत की पूजा की, जिसके प्रताप से उनका पुत्र एक विख्यात राजा बना। तभी से इस पर्व में माता लक्ष्मी के साथ हाथी की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।










