विश्व नदी दिवस विशेष
गंगा की 18 लाख जलधाराएं हुईं विलुप्त
- रेत खनन और बांधों से नदियों के अस्तित्व पर गहरा संकट
- छोटी नदियां बचेंगी, तभी बचेंगी बड़ी नदियां
- नर्मदा में महाशीर मछली पर मंडराया खतरा
- पर्यावरणविदों ने की समग्र संरक्षण नीति की मांग
मंडला महावीर न्यूज 29. 27 सितम्बर को ‘विश्व नदी दिवस’ के अवसर पर पर्यावरणविदों और नदी कार्यकर्ताओं ने देश में नदियों की दयनीय स्थिति और मंडराते जल संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की है। ‘बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ’ के राज कुमार सिन्हा ने एक विस्तृत रिपोर्ट में चेताया है कि पृथ्वी अब ‘वैश्विक जल दिवालियापन’ (Global Water Bankruptcy) के दौर में प्रवेश कर चुकी है। आज बाजारवाद, अनियोजित विकास, रेत खनन और बांधों के जाल ने जीवनदायिनी नदियों को मुनाफे का साधन बना दिया है।
छोटी नदियां उजड़ीं, गंगा की 18 लाख धाराएं हुईं गायब
देश में बड़ी नदियों के संरक्षण पर तो चर्चा होती है, लेकिन उन्हें जल देने वाली छोटी नदियां आज या तो सूख चुकी हैं या बरसाती नाले बन गई हैं। भारत में लगभग 4000 से अधिक नदियां हैं, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार केवल 198 नदियां ही स्वच्छ बची हैं। आईआईटी धनबाद के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अंशु माली के एक हालिया शोध का हवाला देते हुए बताया गया है कि पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जल धाराएं गायब हो गई हैं। प्रदूषित नदियों का सीधा असर अब कृषि और हमारी खाद्य श्रृंखला पर पड़ रहा है।
रेत खनन बना नदियों का काल, कड़े कानून की मांग
नदियों के विनाश का एक बड़ा कारण अवैध और अनियंत्रित रेत खनन है। इससे नदी के तल का क्षरण हो रहा है, जलीय जीवों का आवास नष्ट हो रहा है और भूजल स्तर गिर रहा है। सिन्हा ने मांग की है कि माइन्स एंड मिनरल रेगुलेशन एक्ट 1957 में बदलाव कर रेत को ‘लघु खनिज’ के बजाय ‘प्रमुख खनिज’ (Major Mineral) में शामिल किया जाए, ताकि इसके खनन के लिए सख्त पर्यावरणीय अनुमति का प्रावधान लागू हो सके। साथ ही रेत के वैकल्पिक साधनों की खोज की जानी चाहिए।
नर्मदा के अस्तित्व और ‘महाशीर’ मछली पर संकट
रिपोर्ट में नर्मदा नदी के बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र पर विशेष चिंता जताई गई है। नर्मदा घाटी में 30 बड़े बांध प्रस्तावित हैं, जिनमें से कई बन चुके हैं। इन बांधों के कारण पानी का प्राकृतिक बहाव रुक गया है, जिससे मध्य प्रदेश की राजकीय मछली ‘महाशीर’ के अस्तित्व पर गंभीर संकट आ गया है। पर्यावरणविदों ने मांग की है कि नर्मदा पर कोई भी नया बांध बनाने से पहले, अब तक बने बांधों का नदी की वहन क्षमता पर पड़ने वाले ‘संचयी प्रभाव’ (Cumulative Impact) का गहराई से अध्ययन किया जाए।
दुनिया हटा रही है बांध, भारत को भी लेनी होगी सीख
जहां भारत में नदियों को बांधा जा रहा है, वहीं दुनिया के विकसित देश अपनी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए बांधों को हटा रहे हैं। ‘डेम रिमूवल यूरोप’ के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 23 देशों ने 542 जल अवरोधों (बांधों) को हटाया है।
क्या है समाधान?
राज कुमार सिन्हा का कहना है कि नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के आदेशों का सख्ती से पालन होना चाहिए। ‘नमामि गंगे’ जैसी योजनाएं तब तक सफल नहीं होंगी, जब तक कि स्थानीय समुदायों, मछुआरों, किसानों और आदिवासियों को नदी संरक्षण नीति के केंद्र में नहीं रखा जाता। विश्व नदी दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम नदियों से सिर्फ ले रहे हैं, उन्हें जीवित रखने के लिए वापस क्या दे रहे हैं? क्योंकि जल बचेगा, तभी जीवन और सभ्यता बचेगी।









