भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर रही युवा छात्राएं

बदलाव की नई लहर

जंतर-मंतर से लेकर वैश्विक मंचों तक ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की मुखर आवाज बन रहीं लड़कियां

  • सिर्फ घरेलू नहीं, अब सड़कों पर सत्ता को चुनौती दे रही आधी आबादी
  • भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर रही युवा छात्राएं

मंडला महावीर न्यूज 29. परंपरागत रूप से घर-परिवार तक सीमित रहने वाली भारतीय महिलाओं की भूमिका में अब व्यापक और क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। देश की युवतियां और छात्राएं अब केवल शैक्षणिक या आर्थिक सुधारों तक सीमित नहीं हैं; वे राजनीतिक, संवैधानिक और प्रशासनिक तंत्र को चुनौती देकर ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की सबसे मुखर आवाज बन चुकी हैं। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए बड़े आंदोलनों ने इसका जीवंत उदाहरण पेश किया है।

जंतर-मंतर बना छात्राओं की मुखरता का केंद्र

जुलाई 2026 में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ हुए प्रदर्शन और अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में उतरे छात्र संगठनों में लड़कियों ने अहम भूमिका निभाई। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) और अन्य छात्र संगठनों के नेतृत्व में चले इन लंबे आंदोलनों में लड़कियों ने वैचारिक और जमीनी, दोनों स्तरों पर कमान संभाली। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छात्राओं ने खुद को ‘कमजोर’ समझे जाने वाले मुहावरों से बाहर निकालकर मोर्चे पर स्थापित कर लिया है। चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों में छात्राओं ने यहां तक स्पष्ट किया कि महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती से राज्य का रवैया संवेदनशील नहीं हो जाता; राज्य का चरित्र आज भी पुरुष प्रधान ही है।

जेन अल्फा और जेन जी का वैश्विक आंदोलन

पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ स्कूली बच्चे, विशेषकर ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’, सड़कों पर उतरकर जवाबदेही मांग रहे हैं। यह असंतोष केवल भारत तक सीमित नहीं है। फ्रांस में भी छात्र मैक्रों सरकार की नीतियों—जैसे लंबी स्कूल अवधि, जर्जर इमारतें और पढ़ाई के भारी दबाव—के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

आंदोलनकारी लड़कियों का वैश्विक नेतृत्व

इतिहास गवाह है कि युवावस्था में आंदोलनों का नेतृत्व करने वाली लड़कियां भविष्य की सशक्त नेता बनती हैं:

  • जैसिंडा अर्डर्न (न्यूजीलैंड): युवावस्था में सामाजिक कार्यकर्ता रहीं और 37 वर्ष की उम्र में देश की प्रधानमंत्री बनीं।
  • साना मारिन (फिनलैंड): 34 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बनीं; उनकी गठबंधन सरकार की सभी पांच नेता महिलाएं थीं।
  • कैमिला वैलेजो और इरीना कारामानोस (चिली): छात्र आंदोलनों और नारीवादी सक्रियता से शुरुआत कर सत्ता और नीति-निर्माण के शीर्ष तक पहुंचीं।
  • मलाला यूसुफजई और ग्रेटा थनबर्ग: शिक्षा और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया।

भविष्य की सशक्त राजनेता हैं आज की प्रदर्शनकारी लड़कियां अध्ययन बताते हैं कि आंदोलनकारी पृष्ठभूमि से आने वाली महिला नेता स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और बाल कल्याण जैसे संवेदनशील मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं। जब कोई छात्रा पेपर लीक, बेरोजगारी, चुनावी पारदर्शिता या संविधान की रक्षा के लिए सड़क पर उतरती है, तो वह केवल अपने अधिकार के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र के व्यापक हित में लड़ रही होती है।

जंतर-मंतर पर आज जो लड़कियां सत्ता से सीधे सवाल पूछ रही हैं, वे केवल प्रदर्शन नहीं कर रही हैं, बल्कि अपनी राजनीतिक क्षमता को निखार रही हैं। उनका यह संघर्ष संकेत है कि देश की नई पीढ़ी व्यवस्था से जवाबदेही तय करने के लिए पूरी तरह तैयार है। आज जरूरत इस बात की है कि इन युवा लड़कियों को शिक्षा संस्थानों, राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं में समान अवसर और नेतृत्व का वातावरण मिले, क्योंकि यही लड़कियां देश के भविष्य की सांसद, मंत्री और नीति-निर्माता हैं।


(राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के सौजन्य से)


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