आज़ादी के आठ दशक बाद भी अधूरा है बापू के गांव गणराज्य का सपना

गांधी जयंती विशेष

आज़ादी के आठ दशक बाद भी अधूरा है बापू के ‘गांव गणराज्य’ का सपना

  • कानून बने पर ग्राम सभाओं को नहीं मिली वास्तविक शक्ति
  • सिर्फ पंचायत चुनाव कराने से साकार नहीं होगा ग्राम स्वराज
  • ग्राम सभा को लोकतंत्र की पहली इकाई बनाने की ज़रूरत: राज कुमार सिन्हा

विशेष आलेख

गांधी जयंती विशेष: कागजों और कानूनों में उलझा बापू के ‘गांव गणराज्य’ का सपना, आज भी वास्तविक अधिकारों की बाट जोह रहीं ग्राम सभाएं संवैधानिक प्रावधानों और पेसा कानून के बावजूद सत्ता के केंद्रीकरण ने रोकी ग्राम स्वराज की राह; जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समाज के नियंत्रण से ही बदलेगी तस्वीर

मंडला महावीर न्यूज 29. अगस्त 1947 को देश के पहले स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘मेरे सपनों का भारत सात लाख गांव गणराज्यों का संघ होगा।’ लेकिन आज़ादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बाद भी गांधीजी का यह सपना धरातल पर पूरी तरह साकार नहीं हो सका है। गांधी जयंती के अवसर पर ‘बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ’ के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राज कुमार सिन्हा ने पंचायती राज व्यवस्था और आदिवासी स्वशासन की वर्तमान स्थिति पर गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि गांव को केवल प्रशासन की अंतिम इकाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पहली इकाई बनाना ही बापू के ‘गांव गणराज्य’ की दिशा में सच्चा कदम होगा।

संवैधानिक निर्देश और समितियों के दौर में उपेक्षित रही ग्राम सभा

राज कुमार सिन्हा ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत राज्य से यह उम्मीद की गई थी कि वह ग्राम पंचायतों को स्वायत्त इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक शक्तियां प्रदान करेगा, लेकिन केंद्र व राज्य सरकारें इसमें विफल रहीं।

  • 1952 का पंचशील सिद्धांत: पं. जवाहरलाल नेहरू ने आदिवासी व्यवस्था के लिए पंचशील निर्धारित किए, जिसका मुख्य बिंदु बिना बाहरी हस्तक्षेप के समाज द्वारा अपनी परंपरा के अनुसार स्व-व्यवस्था करने का अधिकार था।
  • बलवंत राय एवं अशोक मेहता समिति: 1956 में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश पर त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था बनी, पर इसमें ग्राम सभा की भूमिका को नजरअंदाज किया गया। 1978 में गठित अशोक मेहता समिति के समक्ष गृह मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा को पूरी व्यवस्था का अधिकार देने का प्रस्ताव रखा, किंतु समिति ने इसे अस्वीकार कर दिया और माना कि ग्राम सभा को केवल जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं, अधिकार नहीं।

डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा की ऐतिहासिक रिपोर्ट और 73वां संविधान संशोधन

अनुसूचित क्षेत्रों के लिए सामान्य पंचायत व्यवस्था शुरू से ही असंगत थी। 1988 में राजीव गांधी के नेतृत्व में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था हेतु संविधान संशोधन प्रस्तावित हुआ, पर उसे संसद की मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद 1990 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयुक्त डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत राष्ट्रपति को अपनी ऐतिहासिक 29वीं रिपोर्ट सौंपी। इसमें अंग्रेजी राज की उस कानून व्यवस्था को नैसर्गिक न्याय के खिलाफ बताया गया, जिसने आदिवासी को अपनी ही जमीन पर जन्मजात अपराधी बना दिया। रिपोर्ट में आदिवासी इलाकों में स्थानीय समाज को अपने संसाधनों के रखरखाव और उपयोग का पूरा स्वशासी अधिकार देने की सिफारिश की गई, लेकिन संसद में इस पर चर्चा तक नहीं कराई गई।

1993 में 73वें संविधान संशोधन (भाग 9) के जरिए ‘ग्राम सभा’ को संवैधानिक प्रतिष्ठा तो मिली, लेकिन उसकी शक्तियां तय करने का जिम्मा राज्य विधानमंडलों पर छोड़ दिया गया। अनुच्छेद 243(ङ) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों को इस सामान्य व्यवस्था से अलग रखा गया और बाद में भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर ‘पेसा कानून’ (PESA) अस्तित्व में आया।

पेसा कानून की मूल भावना और सत्ता का नियंत्रण

सिन्हा ने उल्लेख किया कि अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून की धारा 4(घ) तथा संविधान के अनुच्छेद 243(छ), 243(ज) एवं 275(1) के अंतर्गत ग्राम सरकार एवं स्वशासी जिला सरकार का गठन कर उन्हें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार तथा वित्तीय व प्रशासनिक नियंत्रण हस्तांतरित करने की भावना निहित है। परंतु जमीनी हकीकत यह है कि राज्य की सत्ता आज भी संसाधनों पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखना चाहती है।

कैसे पूरा होगा बापू के ‘गांव गणराज्य’ का सपना? (भविष्य की राह)

राज कुमार सिन्हा के अनुसार, केवल ग्राम पंचायतों के चुनाव करा लेने भर से गांव गणराज्य का सपना पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए निम्नलिखित ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • संसाधनों पर वास्तविक अधिकार: ग्राम सभा को केवल सरकारी योजनाओं पर चर्चा करने वाली संस्था के बजाय शासन की मूल इकाई बनाया जाए। विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि, जंगल, जल, खनिज, लघु वनोपज और स्थानीय संसाधनों से जुड़े निर्णयों में ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार मिलें।
  • सहमति और समीक्षा: विकास की कोई भी योजना स्थानीय समुदाय की सहमति, भागीदारी और सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभावों की पारदर्शी समीक्षा के बिना आगे न बढ़ाई जाए।
  • वित्तीय व प्रशासनिक सक्षमता: केवल अधिकारों की घोषणा पर्याप्त नहीं है; ग्राम सभा के निर्णयों को लागू करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, कर्मचारी और संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।
  • कानूनों की समीक्षा: राज्य सरकारें पेसा कानून के अनुरूप अपने नियमों की समीक्षा करें और जहां राज्य के कानून व ग्राम सभा के अधिकारों में टकराव हो, वहां ग्राम स्वशासन की संवैधानिक भावना को प्राथमिकता दी जाए।
  • नीचे से ऊपर की ओर विकास: शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जल संरक्षण, कृषि और आजीविका से जुड़ी योजनाएं ऊपर से थोपने के बजाय गांव समाज की जरूरतों के आधार पर तय हों। साथ ही आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्थाओं और रीति-रिवाजों को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण से जोड़ा जाए।

लोकतंत्र की पहली इकाई बने गांव

निष्कर्ष के तौर पर सिन्हा ने कहा कि ग्राम स्वराज का अर्थ राज्य की भूमिका समाप्त करना नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की स्वायत्तता को सुरक्षित रखना है। यदि विकास के नाम पर ग्राम सभा की सहमति को महज एक औपचारिकता बना दिया जाएगा, तो गांधी का सपना अधूरा ही रहेगा। लोकतंत्र की मजबूती का रास्ता संसद और विधानसभाओं से होकर गांव तक आता है, लेकिन उसकी असली बुनियाद गांव के लोगों की सामूहिक निर्णय शक्ति में ही निहित है। इसलिए अगली लड़ाई केवल पंचायत चुनावों की नहीं, बल्कि ग्राम सभा को वास्तविक सत्ता और निर्णय का अधिकार दिलाने की है।


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