अस्तित्व, संस्कृति और स्वशासन के संघर्ष का प्रतीक-विश्व आदिवासी अधिकार दिवस

13 सितंबर: विश्व आदिवासी अधिकार दिवस

  • 13 सितंबर: विश्व आदिवासी अधिकार दिवस – अस्तित्व, संस्कृति और स्वशासन के संघर्ष का प्रतीक
  • आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था व्यापक, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन आज भी सबसे बड़ी चुनौती: राज कुमार सिन्हा

मंडला महावीर न्यूज 29.  13 सितंबर का दिन दुनिया भर के आदिवासी समुदायों के अधिकारों और उनके संघर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसी दिन, 13 सितंबर 2007 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 143 देशों के भारी बहुमत से ‘संयुक्त राष्ट्र आदिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा’ (UNDRIP) को स्वीकार किया था। यह घोषणा आदिवासी लोगों के अस्तित्व, गरिमा, कल्याण, संस्कृति, भूमि और उनके सामूहिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय मानकों का एक व्यापक ढांचा प्रस्तुत करती है।

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने इस अवसर पर कहा कि आदिवासी समुदायों का प्रश्न केवल गरीबी या पिछड़ेपन तक सीमित नहीं है। यह उनकी पहचान, संस्कृति, स्वशासन, भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिकारपूर्ण भागीदारी का अहम सवाल है।

भारत में संवैधानिक और वैधानिक रक्षा कवच

भारत के संविधान में भी आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची, विशेषकर अनुच्छेद 244, अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की नींव है। पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपालों को विशेष अधिकार दिए गए हैं ताकि वे यह सुनिश्चित कर सकें कि कोई भी कानून आदिवासी समाज की परंपराओं, संस्कृति और भूमि अधिकारों के प्रतिकूल न हो। भूमि हस्तांतरण पर रोक और साहूकारी जैसी शोषणकारी व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने के लिए राज्यपाल के पास विशेष शक्तियां हैं।

इसके अलावा, अनुच्छेद 275(1) के तहत विशेष अनुदान और अनुच्छेद 338A के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन किया गया है। 73वें संविधान संशोधन के बाद लागू ‘पेसा’ (PESA) अधिनियम, 1996 और ‘वन अधिकार अधिनियम’ (FRA), 2006 ने ग्राम सभाओं को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और स्थानीय स्वशासन में निर्णायक भूमिका सौंपी है। आदिवासी उप-योजना (TSP) के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के लिए विशेष वित्तीय आवंटन भी किया जाता है।

चुनौतियां और विकास का बदलता स्वरूप

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में आदिवासी आबादी लगभग 10.45 करोड़ (8.6%) है। इसके बावजूद, विकास की मुख्यधारा में वे काफी पीछे हैं। साक्षरता दर (विशेषकर महिलाओं में) और बहुआयामी गरीबी के आंकड़े इस असमानता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गरीबी का संबंध केवल आय से नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव से भी है।

सिन्हा का मानना है कि विकास तभी न्यायपूर्ण होगा जब वह आदिवासी समाज की भूमि, संस्कृति, आजीविका और सामुदायिक निर्णय प्रक्रिया को सुरक्षित रखते हुए किया जाए। खनन, बड़े बांध या औद्योगिक परियोजनाओं से होने वाला विस्थापन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्थापन भी होता है।

भारत के संविधान और संयुक्त राष्ट्र की घोषणा में यह समानता है कि आदिवासी समाज को विकास का केवल ‘निष्क्रिय लाभार्थी’ नहीं, बल्कि अपने भविष्य का ‘निर्णयकर्ता’ माना जाना चाहिए। हालांकि भारत में आदिवासी अधिकारों का कानूनी ढांचा मजबूत है, लेकिन असली चुनौती इन कानूनों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है। 13 सितंबर का दिन भारत को अपने संवैधानिक वादों की याद दिलाता है—आदिवासी समाज को केवल संरक्षण नहीं, बल्कि उनके अधिकार और स्वाभिमान के साथ स्वशासन सुनिश्चित करना ही सच्चे लोकतंत्र और न्यायपूर्ण विकास की पहचान है।


राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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