छोटी उम्र, बड़ा संकल्प-9 साल की भूमिका की नर्मदा भक्ति

छोटी उम्र, बड़ा संकल्प-9 साल की भूमिका की नर्मदा भक्ति

न पैरों में चप्पल, न मन में थकान, नन्हीं परिक्रमावासी भूमिका ने जीता सबका दिल

  • आस्था का अनूठा रूप, 9 साल की नन्हीं भूमिका नंगे पैर कर रही नर्मदा परिक्रमा
  • दादा-दादी की बनी लाठी, रोजाना तय कर रही 20 किमी का सफर
  • बाल-हठ के आगे झुके बुजुर्ग, कक्षा 4 की छात्रा का हौसला देख दंग रह गए परिक्रमावासी

मंडला महावीर न्यूज 29. मां नर्मदा की कठिन परिक्रमा के मार्ग में भक्ति के कई रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन निवास विकासखंड के परिक्रमा मार्ग ग्राम गुंदलई पर जब एक 9 साल की नन्हीं बच्ची हाथ में कमंडल लिए नंगे पैर नर्मदे हर का घोष करते हुए गुजरी, तो हर कोई नतमस्तक हो गया। यह कहानी है खरगोन जिले के पीपलझर तहसील बड़वाह की रहने वाली भूमिका मुकाती की। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद और खिलौनों में रमे रहते हैं, उस उम्र में भूमिका अध्यात्म के पथ पर अपने नन्हे कदमों से इतिहास लिख रही है। बताया गया कि यह सिर्फ एक शारीरिक यात्रा नहीं है, बल्कि आस्था का वह अटूट विश्वास है जहाँ तर्क पीछे छूट जाते हैं। भूमिका ने साबित कर दिया है कि जब मन में मां नर्मदा के प्रति अटूट प्रेम हो, तो उम्र और रास्ते की मुश्किलें मायने नहीं रखतीं।जानकारी अनुसार भूमिका मुकाती जिनके पिता महेश मुकाती हैं, जो कक्षा चौथी की छात्रा है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेल-कूद की दुनिया में मगन रहते हैं, उस उम्र में भूमिका ने एक संन्यासी की भांति जीवन को अपनाया है। वह अपने दादा कड़वाजी मुकाती 65 वर्ष और दादी सक्को बाई 62 वर्ष के साथ माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रही है। बताया गया कि कड़वाजी की यह तीसरी और दादी की दूसरी नर्मदा परिक्रमा है, लेकिन भूमिका के लिए यह पहला और जीवन बदलने वाला अनुभव है।

जिद से शुरू हुआ भक्ति का सफर 

भूमिका के परिवार में छह बहनें और एक छोटा भाई है। दादा, दादी के साथ समय बिताने के कारण भूमिका का झुकाव बचपन से ही पूजा-पाठ और आरती-भजन की ओर रहा है। जब दादा-दादी ने 4 दिसंबर को ओंकारेश्वर से नर्मदा परिक्रमा उठाने की तैयारी की, तो भूमिका ने भी साथ जाने की जिद पकड़ ली। दादा-दादी ने रास्ते की कठिनाइयों और शारीरिक थकान का हवाला देते हुए उसे बहुत समझाया, लेकिन भूमिका की बाल हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा।

दादा-दादी का सहारा बनी नन्हीं नातिन 

नर्मदा परिक्रमा के दौरान यह नन्हीं बिटिया अपने बुजुर्ग दादा-दादी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। उसके दादा कड़वाजी भावुक होकर बताते हैं कि वे प्रतिदिन लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर दादा-दादी तो बीच-बीच में थककर रुक जाते हैं, लेकिन भूमिका के चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं होता। दादा कहते हैं कि हम तो बूढ़े हैं, सांस फूल जाती है, पर हमारी नातिन नहीं थकती। वह हमसे आगे दौड़ती हुई निकल जाती है और हमारा उत्साह बढ़ाती है। इस यात्रा में वह हमारी लाठी बन गई है।

अमरकंटक की ओर बढ़ते कदम 

कड़कड़ाती ठंड में सुबह का बर्फीला स्नान और फिर पथरीले रास्तों पर नंगे पैर चलना, भूमिका की दिनचर्या बन गई है। हाथ में छोटा सा कमंडल और माथे पर तिलक लगाए यह नन्हीं परिक्रमावासी फिलहाल अमरकंटक की ओर बढ़ रही है। उसे देखने वाले ग्रामीण और अन्य परिक्रमा वासी उसकी अटूट श्रद्धा को देखकर दंग हैं।



रिपोर्टर- रोहित प्रशांत चौकसे


 

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