मशरूम उत्पादन बना किसानों की अतिरिक्त आय का सशक्त जरिया

खेती के साथ मशरूम का साथ

बिछिया के किसानों ने कम लागत में खड़ी की मुनाफे की नई फसल

  • 10 बाय 10 के कमरे से बदली किस्मत
  • मात्र 2 हजार के निवेश से किसान मनोज ने कमाए 8 हजार रुपये

बिछिया में मशरूम उत्पादन बना किसानों की अतिरिक्त आय का सशक्त जरिया

मंडला महावीर न्यूज 29. कहते हैं कि यदि सोच आधुनिक हो और मेहनत का साथ मिले, तो पारंपरिक खेती भी समृद्धि के नए द्वार खोल सकती है। मंडला जिले के बिछिया क्षेत्र के किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ मशरूम उत्पादन को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की एक नई मिसाल पेश की है। प्रशासन के सहयोग और किसानों के जज्बे ने आज मशरूम उत्पादन को यहाँ एक आर्थिक सशक्तिकरण के मॉडल के रूप में स्थापित कर दिया है।

प्रशिक्षण से मिली नई दिशा

अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) श्रीमती सोनाली देव और वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी मुकेश कुलस्ते के मार्गदर्शन में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम ने इस बदलाव की नींव रखी। आजीविका परियोजना के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में 70 किसानों को मशरूम उत्पादन की बारीकियां सिखाई गईं। वर्तमान में नरेनी माल, कन्हारी कला और गदिया चंगरिया के लगभग 50 किसान सफलतापूर्वक इस व्यवसाय से जुड़े हैं। इस मुहिम में मनोज धूमकेती और श्रीमती बैसखिया बाई ‘मास्टर ट्रेनर’ की भूमिका निभाते हुए अन्य ग्रामीणों को भी आत्मनिर्भर बना रहे हैं।

कम लागत, अधिक मुनाफा

ग्राम नरेनी माल के किसान मनोज धूमकेती इस सफलता के प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने मात्र 10×10 के एक छोटे से कमरे में मशरूम उत्पादन शुरू किया। मनोज ने बताया कि 50 मशरूम बेड तैयार करने में उनका खर्च महज 2 हजार रुपये आया, जबकि उत्पादन के पहले चक्र में ही उन्हें 8 हजार रुपये की आय प्राप्त हुई। उनका मानना है कि कम समय, कम जगह और न्यूनतम निवेश में यह किसानों के लिए आय का बेहतरीन अतिरिक्त साधन है।

प्रशासन ने थपथपाई पीठ

हाल ही में मनोज धूमकेती ने कलेक्ट्रेट पहुँचकर अपने द्वारा उत्पादित मशरूम बेड अधिकारियों को भेंट किए। कलेक्टर ने उनके इस नवाचार की मुक्तकंठ से सराहना की और जिले के अन्य किसानों को भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित किया। प्रशासन का मानना है कि ऐसे लघु उद्योगों से न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

आज बिछिया के किसानों का यह छोटा सा प्रयोग एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जो ‘खेती के साथ मशरूम’ के मंत्र को साकार कर रहा है।



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